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जब बाबा जी ने अवतार लिया और द्वारकामाईं में बाबा भोजन बनाते थे ये उस समय की बात है ।लंगर के लिये सब्जी मनमाड से लाईजाती थी। दोपहर बाद दो या तीन सेवादार सब्जी लेने' जाते थे ।और शाम तक आ जाते थे ।मण्डी में एक सेवादार भाई था जो उनको सब्जी दिलवाकर उन्हे गाड़ी में बैठा देता था। एक दिन उनकी गाड़ी छूट गई और उन्हे उससेवादार के घर रुकना पडा़ जो भाई मण्डी सेउन्हे सब्जी दिलवाता था ।वह भाई बहुत गरीबथा ।जब वे सेवादार रात को खाना खा रहे थेतो सब्जी में नमक कम था। जब सेवादार भाईयों ने नमक मांगा तो घर में उस दिन नमक खत्म होगया था। उसने दूकान से नमक लाने की सोची तो घर में पैसे भी नही थे ।उस भाई ने नमक न होनेपर सेवादारों से माफी मांगी कि आपको बिना नमक का खाना पडा। सेवादार बोल ेकोई बात नही   हम वैसे ही खा लेंगे। अगली सुबह वे सब्जी लेकर शिरडी आ गये। जब वे सेवादार बाबा से मिले तो शिकायत की मण्डी वाला भाई कितनी सेवा करता है। उसके भाग्य में थोड़े नमक के लिये पैसे तो लिख देते ।बाबा बहुत ही दयावान  है ।बाबा जी बोले अच्छा ये बात है कोई नी दे देने हां। अगले कुछ ही दिनो में मालिक की ऐसी कृपा हुई उस भाईकी खाली पडी जमीन के पास से सरकार ने बाईपास निकालने की योजना को मंजुरी दे दी। उस भाई ने सडक के किनारे बहुत सी दुकानें बनवादी और किराए पर दे दी। बह भाई कुछ ही दिनो में करोडपति बन गया और अपने बिजनेस में उलझ गया ।बिजनेस में उलझने के कारण उसका सतसंग छूट गया ।सेवा भी छूट गई। अब उसेअपने बिजनेस से फूरसत ही नही मिलती कि वह सेवाकर सके और सतसंग सून सके ।एक दिन वही सेवादार उससे मिलने गये तो वह काम में इतना उलझा हुआ था कि वह उन्हे मिल ही नही पाया ।वे सेवादार द्वारकामाई आए और बाबा जी से मिले और बोले कि आपने तो उसको नमक के लिये कुछ ज्यादा ही पैसे दे दिये ।वे हमें क्या नही दे सकते।लेकिन हम उनके दिये की कदर नही करते और दूनियां दारी में उलझ जाते है। माया हमें सतसंग और सेवा से दूर कर देती है।

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